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प्रकृति की पुकार

सब यहाँ कुछ खोया सा है

ये वक़्त का ठहर जाना है या किसी आने वाली पहर का इशारा है


कौन है वो जो हमसे रूठा है

किसका वो घर था जो हमने छीना है


वो चिड़िया जो पेड़ पे घोसला बनाती थी

वो नदिया जो साफ़ पानी को किनारे लाती थी

वो धरती जिसे हमने बंजर कर दिया है

वो वादियां जिसमे अब सिर्फ धुआं दीखता है


मौसम में अब नहीं वो बात है

इंसान क्या बस यही तेरी औकात है


सब यहाँ कुछ खोया सा है

ये वक़्त का ठहर जाना है या किसी आने वाली पहर का इशारा है



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